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राहुल के सनातन विरोधी मंतव्य

– पार्थसारथि थपलियाल

संयोजक भारतीय संस्कृति सम्मान अभियान

राहुल गांधी कुछ लोगों के आंखों के तारे हो सकते हैं। कुछ लोगों के लिए वे परम ज्ञानी भी हो सकते हैं, लेकिन इस तथ्य को नही भूलना चाहिए कि राहुल गांधी सनातन विरोधी हैं। वे राजनीति में जो कुछ कर रहे हैं वह देश का मामला है। वे विपक्ष के नेता हैं इससे यह आशय है कि वे सार्वजनिक महत्व के पद पर हैं। राष्ट्रीय धारणा के विपरीत उनके सार्वजनिक मंचों पर दिए गए बयान उन्हे उत्तरदायी बनाते हैं। भारत मूलतः सनातन संस्कृति का देश है। इसमें आस्तिक और नास्तिक दर्शन दोनों ही मान्यता प्राप्त हैं। वैवश्वतमनु, ऋषि कपिलाचार्य, कणाद, गौतम, पतंजलि, बदरायण, जैमिनी, वात्स्यायन, और बुद्ध, महावीर,चार्वाक आदि प्रज्ञा पुरुषों ने विभिन्न तरह के अनुसंधान किए अथवा समाज का मार्गदर्शन किया। ईश्वरीय अवधारणा पर इनके विचार वैविध्य लिए हुए हैं। लेकिन वेद वाक्य “एकोहम द्वितीयोनास्ति”।। मैं एक ही हूं दूसरा नहीं।। “ईशावास्यं इदम् सर्वम् यत् किंचित् जगत्याम् जगत”…। ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है।

सार्वजनिक जीवन में रहनेवालों को अपने बारे में स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करना चाहिए। उन्हें भारतवासियों को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि वे किस पंथ के अनुगामी हैं। क्योंकि उनके दार्शनिक विचार भारतीय संस्कृति से मेल नहीं खाते। अभी अमेरिका दौरे पर उन्होंने देवता की जो परिभाषा बतायी वह उन्होंने किस शास्त्र में पढ़ी, किस गुरु ने उन्हें वह परिभाषा बतायी वह किसी भी रूप में ग्राह्य नही है।

राहुल गांधी और उनसे जुड़े उनके…. बीरबल जो वायु की तरह सर्वत्र हैं, जिन्हे खुद ही भारतीय संस्कृति के बारे में मालूम नही वे राहुल गांधी को बहुरूपिया की तरह घुमाते रहते हैं। अगर राहुल गांधी सनातनी होते तो वे इंडी गठबंधन के उन लोगों को फटकारते जो सनातन को पाखंड बता रहे थे अथवा सनातन को जड़ से उखाड़ फेंकने वाले वक्तव्य दे रहे थे। सच्चाई तो यह है राहुल गांधी को जितना पढ़ाया जाता है वे उतना बोल देते हैं। संसद के पिछले सत्र में वे कई मजहबों और सनातन धर्म के देवताओं, अवतारों और महापुरुषों की अभय मुद्रा का प्रदर्शन कर रहे थे। शिव जी के बारे में जो अनर्गल बोला गया, उससे यह लगा कि उनके किसी गुरु ने अपनी प्रज्ञा से जो बताया, वे बोल दिए। श्रीमान को यह मालूम नही कि उसी राज्य सभा में भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ डॉ. सुधांशु त्रिवेदी भी बैठते हैं और लोक सभा में विश्लेषक डॉ. निशिकांत दुबे भी हैं। उनका ये कथन कि “हिंदू धर्म में शक्ति एक शब्द है, और हम शक्ति से लड़ रहे हैं।” क्या यह सनातन के हित में दिया गया बयान है।

आपकी अभिव्यक्ति यदि समाज विरोधी होगी तो आपका विरोध भी होगा। 15 अगस्त 2018 के समाचार पत्रों में राहुल गांधी का हैदराबाद में दिया हुआ बयान भी हाथ लगा जिसमें उन्होंने कहा था “मैं किसी तरह के हिंदुत्व में विश्वास नहीं करता”। भाई जब हिंदू धर्म में विश्वास नही करते हो तो कभी गेरुआ वस्त्र, कभी रुद्राक्ष धारण करना, पीतांबरी ओढना, ये सब ढोंग क्यों करते हो। राहुल गांधी भारत में वोटों के लिए बहुरूपिया बनकर मंदिर मंदिर घूमते हैं और विदेश जाकर सनातन संस्कृति को अपमानित करते हैं। अमेरिका में ही उन्होंने भारत में विभिन्न समुदायों को मिल रहे आरक्षण पर जो कहा वह भी सोचनीय है। ऐसा ही भारतीय समाज में जातीय जन गणना को लेकर भी उनके विचार हैं। उनके विचारों में अंग्रेजों की “फूट डालो और राज करो” की नीति नजर आती है। भारतीय समाज को कभी उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत, कभी बजट की हलवा सेरेमनी में कितने ओबीसी, एसटी, एससी अधिकारी थे, का सवाल उठाते हैं। उन्होंने कभी यह नहीं बताया कि वे पिछले 20 वर्षों में किसी अन्य योग्य कांग्रेसी नेता के लिए जगह क्यों नही छोड़ रहे हो।

उनसे बेहतर नेतृत्व देने वाले लोग कांग्रेस में हैं। विदेश में भारत के विरुद्ध वक्तव्य देना किसी भी नेता के लिए उचित नहीं है। राहुल गांधी राजनीति करें, जमकर करें लेकिन भारत विरोधी वक्तव्य देने से उन्हें बचना चाहिए। जिन अमेरिकी सांसद के साथ वे थे, वे भारत विरोधी बयानों के लिए जाने जाते हैं। भारत का मूल सनातनी समाज धरती को माता कहता है। राष्ट्र का वैभव ही उनका गौरव है। आप राजनीति में रहकर भारत के भविष्य निर्माता नही हो जाते। नेता की भूमिका व्यवस्थापक की ही होती है मालिक की भूमिका की आम जनता की है।

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